शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

Shiv Tandav Kya Hai?

नमस्कार दोस्तों Pageofhistory में एक बार फिर आपका बहुत-बहुत स्वागत है आज हम History Of India In Hindi मे शिव और उनके तांडव के बारे में बात करेंगे | 



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शिव को दो अवस्था मे समझा जाता है एक समाधि की अवस्था जिसे अति संवेदनशील अवस्था भी कहते हैं | और दूसरी उनकी तांडव अवस्था जिसे नृत्य अवस्था भी कहा जाता है |  समाधी अवस्था उनकी निर्गुण अवस्था है  यह उनकी गैर भौतिक अवस्था है जिसमें शिव किसी रूप मे उपस्थित नहीं होते है | जबकि तांडव अवस्था उनकी सवगुण अवस्था है मतलब यह उनकी भौतिक अवस्था है जिसमें शिव किसी न किसी रूप में उपस्थित होते हैं |  ब्राह्मण शिव का नृत्य विद्यालय है उनका खेल मैदान है | विकी वर्तक नहीं है वे उसकी पर्यवेक्षक भी है असल में नटराज अपनी नृत्य के माध्यम से ब्रह्मांड में हलचल का निर्माण करने की भूमिका निभाते हैं जब वह नृत्य रोकते हैं दृश्य और अदृश्य निर्माण जो भी हुआ होता है स्वयं में विलीन कर लेते हैं | 



इसके बाद नटराज अकेले रहते हैं आनंद में तल्लीन हुए | संक्षेप में नटराज सभी ईश्वरी गतिविधि का प्रकट रूप है | 

नटराज का नृत्य भगवान के पांच कर्मो अर्थात सृष्टि,जीविका,विघटन,मोहमाया और प्रारंभ के आवरण का प्रतिनिधित्व करता है | तब फिर तांडव क्या है इसका वर्णन संगीत रत्नाकर के अध्याय 5 श्लोक 5 और 6 में मिलता है इसके अनुसार ऋषि भरत को शिव ने उद्धत नृत्य दिखाया | उन्होंने पार्वती से भी लास्य नृत्य कराया | इसमें हाथ मुक्त रहते हैं और लहरों की तरह बहते रहते हैं | तब ऋषि भरत को एहसास हुआ कि मृतक तांडव है जिसके बाद में उन्होंने इसे मानव सभ्यता तक पहुंचाया | 



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ऐसा नृत्य जिसमे शरीर हर कोशिका यानि की कण - कण से शिव ध्वनि प्रमुख रूप से निकलती है | तांडव कहा जाता है | ब्रह्मांड में जितनी भी हलचल है उसका कारण शिव तांडव ही है | तांडव के सात  प्रकार है आनंद तांडव, संध्या तांडव,कलिका तांडव,कृपुरा तांडव,गौरी तांडव,संघार तांडव,उमा तांडव  है | संध्या तांडव का वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है शिव जो तीनों लोकों के स्वामी है गौरी को दुर्लभ नगीनों से बना मुकुट प्रदान करते हैं |  और इस नृत्य को शाम के समय करते हैं | जब शिव नृत्य करते हैं | सरस्वती अपनी वीणा बजाती हैं | इंद्र बांसुरी बजाते हैं | ब्रह्मा मृदंग बजाते हैं और सारे देवता पास खड़े देखते हैं | इन सातों तांडव प्रकारों में गौरी तांडव और उमा तांडव सबसे भयावह और डरा देने वाले हैं | 



शिव वीरभद्र का रूप धारण करते हैं और गौरी के साथ ही रहते हैं | शिव भी नृत्य श्मशान में आत्माओं के बीच जहा लाशे जल रही होती है वहा करते है | शिव और शक्ति के अनुयायियों का मानना है कि यह सब नृत्य इन्हें विशिष्ट सिद्धांतों के प्रतीक हैं | इस तरह के विनाशकारी नृत्य शिव से न केवल संपूर्ण ब्रह्मांड का नाश कर देते हैं बल्कि जीवो और आत्माओं को सब बंधनों से मुक्त भी कर देते हैं | जबकि सभी देवी शक्तियां और राक्षसी शक्तियां तांडव के दौरान अत्यंत उत्साहित और शिव के निकट प्रतीत होती है | 



शिव तांडव स्त्रोत :-




जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

 

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

 

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

 

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

 

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

 

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

 

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

 

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ 

 

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

 

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

 

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

 

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

 

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

 

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

 

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

 

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

 

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

 

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥  > >




ओम नमः शिवाय



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